अरे बिटिया जरा बबुआ को गोद में उठा लो मैं सीट पर बैठ जाऊंगा।
अपर्णा को आवाज जानी-पहचानी लगी और उसने घूंघट हटाकर देखा तो पता चला कि
वे मास्टर साहब हैं, जिनसे पढऩे के दौरान कितनी बार मार खाई थी। एकबारगी
तो उसने चाहा कि बबुआ को बैठा रहने दे, लेकिन ठहरी तो वह मां तो झट से
बबुआ को गोद में बैठा लिया।
सीट पर बैठते ही बस भी चल पड़ी और मास्टर साहब की बातें भी।
अपर्णा चुपचाप उनकी आवाज सुनती जा रही थी, और वे देश से लेकर दुनिया तक
के तमाम मुद्दों पर बोलते जा रहे थे।
------------------------------
अचानक अपर्णा ने घूंघट हटाया और उनकी तरफ देखा, चश्मा को ठीक करते हुए
मास्टर बोले अरे तुम...
बड़े ठाकुर तो बोल रहे थे कि तुम विदेश चली गई हो किसी राजकुमार से शादी
करके। अब तुम शहर चली गई पढऩे, तो तुम्हारी हवेली का रास्ता भी भूल गया।
कभी-कभी तुम्हारे बाबूजी बड़े ठाकुर के बारे में बच्चों से सुनने को मिल
जाता है।
कुछ महीने पहले गया था उनसे मिलने तो तुम्हारे बारे में पता चला।
और बताओ दूल्हे बाबू कहां हैं और तुम बड़े ठाकुर की बेटी होकर खटारा बस में कैसे?
आसपास के लोग भी बड़े ठाकुर का नाम सुनकर चौकस हो गए और अपर्णा की तरफ
एकटक देखने लगे।
अपर्णा खामोश रहना चाहती थी, कैसे बताए कि जिस दिन उसने बगान में काम
करने वाले रमेश से शादी की बड़े ठाकुर ने इज्जन की दुहई देकर उसे घर से
भगा दिया।
दुर्भाग्य यहां तक रहता तो ठीक ससुराल में भी सुख नहीं मिला। शादी के बाद
कुछ समय तक सब अच्छा लगता था लेकिन चूल्हे से उठते धुंए इतना तंग नहीं
करते जितना सास के ताने।
बबुआ हुआ तो ताने बढ़ गए थे, रमेश भी कामधाम छोड़ के घर बैठ गया।
बड़े ठाकुर की बेटी को दूसरों के घर में चौका-बर्तन करके परिवार चलाना पड़ रहा था।
प्यार की इतनी बड़ी कीमत चुकाई थी अपर्णा ने कि बस वो ही समझ सकती थी,
एक तो बड़े ठाकुर से रिश्ता टूटा ऊपर से पति की बीमारी से काम छूट गई।
---------------------------
अचानक बस हिचकोले लेता है तो अपर्णा का ध्यान भंग होता है। और वो एकटक
मास्टर साहब और भीड़ को देखने लगती है।
वो बताती है कि कार खराब हो गई तो बस में जा रही है। तभी कंडक्टर आकर
टिकट मांगता है। अपर्णा हाथ में दस रुपए के मुड़े नोट बढ़ाती है। लेकिन
भाड़ा तो बीस रुपए था सो बकझक शुरू।
अपर्णा भी कंडक्टर से भिड़ गई, अगर लूटना ही है तो बैंक चले जाओ। इतना ही
भाड़ा है लेना है तो लो नहीं तो चलते बनो।
हालांकि मास्टर साहब बीच-बचाव करते हैं और अपनी तरफ से दस का नोट बढ़ा देते हैं।
अपर्णा हंसते हुए कहती है कि वो पर्स कार में रह गया था सो दस रुपए ही हाथ में हैं।
एकबार फिर मास्टर साहब पूछने लगते हैं ससुराल के बारे में...
इस बार अपर्णा बताने लगती है कि पति फैक्टरी लगवाने दूर परदेस गए हैं। अब
इतना बड़ा कारोबार है कि घर बैठकर संभाला नहीं जाता। आज यहां तो कल वहां।
साथ के यात्री भी हां में हां मिलाते हैं। शायद वे अपर्णा की स्थिति समझ
रहे थे।
---------------------------
अपर्णा बताती है कि शादी के बाद उसे बड़े ठाकुर की हवेली से ज्यादा खुशी मिली।
पति के पास सबकुछ है। सास तो बेटी मानती है। पैसे इतने हैं कि
गिनते-गिनते सात पीढ़ी अघा जाए।
नौकरों की फौज रहती है। बबुआ तो सबकी आंखों का तारा है। अब कपड़े इतने
गंदा करता है कि पता ही चल रहा कि आज इसने नया कपड़ा पहना है। खास ऑर्डर
देकर बनवाया है इसे मास्टर साहब।
मास्टर साहब को खुशी होती है कि चलो बड़े ठाकुर की बेटी अच्छे घर गई।
वे कहते हैं कि लड़की की शादी करना आसान है लेकिन घर बसाना मुश्किल।
बड़े ठाकुर के अच्छे कर्म के चलते ही अपर्णा खुश है। अन्य लोग हां में
हां मिलाते हैं।
तपाक से मास्टर साहब सवाल करते हैं वैसे बस से कहां जा रही हो, मायके....
अपर्णा इसका जवाब नहीं देना चाहती थी फिर भी कहा कि हां।
------------------------------
पिताजी ने बुलावा भेजा है आने को। वैसे बबुआ का पहला साल है तो हवेली ले
जा रही हूं।
अपर्णा गोद में सो रहे बबुआ को देखकर खुश होने का नाटक करती है।
यात्री भी खुश हैं कि उन्हें राजकुमारी के साथ बैठने का अवसर जो मिला है।
वो तो आज तक बड़े ठाकुर की हवेली का नाम सुनते थे या बाहर से देखा था।
आज हवेली की बेटी उनके बीच है तो खुश होना लाजिमी है।
अचानक कंडक्टर आवाज लगाता है कि हवेली जाने वाले आगे आएं बस रूकेगी...
मास्टर साहब समेत अधिकांश यात्री आगे बढ़ जाते हैं
अपर्णा अपनी सीट पर जमी रहती है।
मास्टर साहब उसकी ओर देखते हैं तो अपर्णा के आंखों से आंसू की धारा बह निकलती है।
वे समझ जाते हैं कि हवेली के बड़े ठाकुर की बेटी का दर्द।
वो सौ रुपए का नोट अपर्णा के हाथों में पकड़ाकर कहते हैं बबुआ को मिठाई
दिला देना और उतर जाते हैं।
अपर्णा नोट कंडक्टर की तरफ बढ़ाकर वापसी का टिकट मांगती है। भूख से बबुआ
बिलबिला रहा है।
मास्टर साहब सड़क से उतरकर पगडड़ी के सहारे अपने घर की तरफ बढ़ते जाते हैं।
अपर्णा दूर खेत के दूसरी छोर स्थित हवेली देखती है। अब वो वहां नहीं जाएगी।
इस बार उसे बाबुल की इज्जत का ख्याल था जो शादी के समय कहीं गुम हो गया था शायद...
--------------------------
Abhishek
5 December 2016, Sunday, Jaipur.
+91 9939044050
+91 9334444050
No comments:
Post a Comment